सैलून की छोटी-सी दुकान में उस दिन कुछ अलग-सी शांति थी। बाहर गली में रोज़ की तरह चहल-पहल थी, लेकिन अंदर कुर्सी पर बैठी वह चुप थी। कंधों पर भूरे रंग का कपड़ा डाला गया था, और उसके लंबे बाल आख़िरी बार उसकी पीठ को छू रहे थे।
भाग्य राव, जो मोहल्ले के पुराने और भरोसेमंद नाई थे, ने धीरे से पूछा,
“पक्का कर लिया है ना?”
उसने हल्की-सी मुस्कान दी।
“हाँ काका, अगला दिन नया होना चाहिए।”
आईने में खुद को देखते हुए उसके मन में कई यादें चल रही थीं। बचपन से उसने कभी छोटे बाल भी नहीं रखे थे। त्योहारों पर माँ तेल लगाकर चोटी बनाती थीं। सहेलियाँ उसके घने बालों की तारीफ करती थीं। लेकिन आज ये सब पीछे छूटने वाला था।
मशीन की हल्की-सी आवाज़ कमरे में गूँजी।
पहली लट जैसे ही गिरी, दिल थोड़ा धड़का। पर आँसू नहीं आए। उसे लगा जैसे वह सिर्फ बाल नहीं, बल्कि अपने अंदर जमा डर, संकोच और पुराने बोझ को भी उतार रही हो।
भाग्य राव बड़े ध्यान से मशीन चला रहे थे। हर स्ट्रोक के साथ सिर हल्का होता जा रहा था। आसपास खड़े दो-तीन लोग मोबाइल से वीडियो बना रहे थे, कोई मुस्कुरा रहा था, कोई हैरान था।
कुछ ही मिनटों में उसके सिर पर सिर्फ महीन बालों की परत बची थी। फिर उस्तरा चला — धीरे, सावधानी से।
जब सब खत्म हुआ, भाग्य राव ने तौलिये से उसका सिर पोंछा और आईना सामने कर दिया।
वह कुछ पल खुद को देखती रही।
साफ, चमकता हुआ सिर। बड़ी-बड़ी आँखें। चेहरे पर अजीब-सी ताकत।
उसे लगा जैसे वह खुद को पहली बार सच में देख रही हो — बिना किसी आड़, बिना किसी सजावट के।
“कैसा लग रहा है?” भाग्य राव ने पूछा।
वह मुस्कुराई।
“हल्का… और मजबूत।”
सैलून से बाहर निकलते समय हवा सीधे उसके सिर को छू रही थी। यह एहसास नया था, लेकिन अच्छा था। लोग मुड़-मुड़कर देख रहे थे, पर उसे अब परवाह नहीं थी।
उस दिन भाग्य राव सैलून में सिर्फ एक मुंडन नहीं हुआ था।
वह एक नई शुरुआत थी।
एक साहस था।
एक वादा था — खुद से।
और सच में, अगला दिन उसके लिए बिल्कुल नया था। ✨
