बालों की आज़ादी

 यहाँ राधिका मदान के लिए एक पूरी तरह से कस्टम-मेड, काल्पनिक **हेड शेव** स्टोरी है हिंदी में। इसे थोड़ा इमोशनल, ड्रामेटिक और पावरफुल बनाया है, जैसा कि एक ऐक्टress की जर्नी में फिट बैठता है:

**बालों की आज़ादी**

राधिका मदान उस दिन सुबह-सुबह मुंबई के अपने छोटे से अपार्टमेंट की बालकनी पर खड़ी थी।  

हवा में हल्की ठंडक थी, पर उसके मन में एक तूफान चल रहा था।  

आईने के सामने खड़े होकर वो अपने लंबे, घने, काले बालों को बार-बार छू रही थी।  

ये वही बाल थे जिन्हें लोग "राधिका का ट्रेडमार्क" कहते थे।  

फिल्मों में ये लहराते, पोस्टरों पर चमकते, फैन पेज पर ट्रेंड करते।  

पर आज वो बाल उसे बोझ लग रहे थे।  

एक बोझ, जो उसकी असल पहचान को छुपा रहा था।

पिछले कुछ महीनों से राधिका एक ऐसी फिल्म की तैयारी कर रही थी जो उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा रिस्क था।  

एक ऐसी किरदार—एक लड़की जो सब कुछ खोकर, सबसे आखिरी चीज तक—अपने बालों तक—खुद को आज़ाद करती है।  

डायरेक्टर ने कहा था, "राधिका, अगर तुम सच में ये रोल निभाना चाहती हो, तो सिर्फ एक्टिंग नहीं… बल्कि ट्रांसफॉर्मेशन चाहिए।"  

राधिका ने हँसकर कहा था, "मैं तैयार हूँ।"

पर तैयार होना और सच में वो कदम उठाना—दो अलग बातें थीं।

उस दिन शाम को वो Sunny Hairport पहुँची।  

सैलून में पहले से ही हलचल थी।  

उसके स्टाइलिस्ट ने उसे देखते ही पूछा,  

"पक्का है ना? इतने खूबसूरत बाल… सब कुछ?"

राधिका ने गहरी साँस ली।  

"हाँ। सब कुछ। आज से ये बाल मेरे नहीं रहेंगे।  

ये किरदार मेरे अंदर उतरना चाहता है… और इसके लिए मुझे बाहर से खाली होना पड़ेगा।"

कुर्सी पर बैठते ही उसने आँखें बंद कर लीं।  

पहले कैंची चली।  

लंबे-लंबे लॉक धीरे-धीरे फर्श पर गिरने लगे।  

हर कट के साथ उसका दिल हल्का होता जा रहा था।  

फिर क्लिपर की आवाज़ आई—बज्ज़… बज्ज़… बज्ज़…  

ठंडी धातु की सनसनाहट उसके स्कैल्प पर दौड़ने लगी।  

वो काँप गई, पर मुस्कुराई भी।  

"ये डर नहीं… ये आज़ादी है," उसने मन ही मन कहा।

जब क्लिपर ने आखिरी पास मारा, तो पूरा सैलून खामोश हो गया।  

राधिका ने आँखें खोलीं।  

आईने में एक नई राधिका थी।  

चमकदार, गोरा स्कैल्प।  

बिना किसी ढके-छुपे के चेहरा।  

आँखें और भी बड़ी, और भी गहरी।  

उसने हाथ ऊपर उठाया और धीरे से अपना सिर छुआ।  

बहुत मुलायम… बहुत नया… बहुत सच।

"वाह…" स्टाइलिस्ट की आँखें नम हो गईं।  

"तुम अब पहले से कहीं ज्यादा खूबसूरत लग रही हो।"

राधिका हँसी।  

"खूबसूरती अब बालों में नहीं… मेरे इरादों में है।"

अगले दिन जब वो फिल्म के सेट पर पहुँची,  

पूरी यूनिट स्तब्ध रह गई।  

डायरेक्टर ने उसे गले लगाया और कहा,  

"अब मैं समझ गया… तू सिर्फ एक्ट नहीं कर रही, जी रही है।"

शूटिंग के दौरान राधिका ने कभी भी स्कार्फ या विग नहीं पहना।  

वो गर्व से अपना मुंडा सिर लेकर चलती थी।  

हर सीन में उसकी आँखों में एक अलग आग थी।  

फिल्म खत्म होने के बाद जब ट्रेलर रिलीज़ हुआ,  

सोशल मीडिया पर तूफान आ गया।  

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लोग हैरान थे, इंस्पायर थे, कुछ को समझ नहीं आ रहा था।  

पर राधिका को सब समझ आ रहा था।

उस रात वो घर लौटी, अपने बालों के ढेर को देखा जो अब भी फर्श पर पड़ा था।  

उसे उठाया, एक छोटी सी डायरी में रखा और लिखा:

"आज मैंने बाल नहीं खोए…  

मैंने एक पुरानी राधिका को अलविदा कहा।  

अब जो बची है, वो असली है।  

और असली हमेशा जीतती है।"

राधिका मदान अब सिर्फ एक एक्ट्रेस नहीं थी।  

वो एक आज़ाद आत्मा थी।  

बालों के बिना भी… पूरी तरह से पूरी।

(कहानी पूरी तरह काल्पनिक और मनोरंजन के लिए लिखी गई है।)